
Nirdhan Ro Dhan Girdhari
निर्धन रो धन गिरधारी,
निर्धन रो धन साचो रे सांवरा,
ए निर्धन रो धन गिरधारी,
निर्धन रो धन साचो रे सांवरा हा ।
दुर्बल जात सुदामा कहिजे,
पूछत है उनकी नारी,
हरी सरीके मित्र तुम्हारे,
अजहुन गयी दुविधा थारी ।
तिरीया जात समझ की ओची,
क्या सुमती गई है मारी,
कर्मो मे दरिद्र लिखीयो है,
क्या करे मेरो गिरधारी ।
दो दो पेड कदम के तारे,
तार गई गौतम नारी,
विश्वामित्र को यज्ञ सफल कर,
आप बने हरी अवतारी ।
एक विश्वास राख एक धारा,
प्रभु को पुरण गिरधारी,
दास सुदामा राख भरोसो,
कंचन महल हुआ क्यारी ।
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