
रचा है सृष्टि Racha Hai Srishti Ko Jis Prabhu Ne
रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने
वही ये सृष्टि चला रहे है
जो पेड़ हमने लगाया पहले
उसी का फल हम अब पा रहे है
इसी धरा से शरीर पाए
इसी धरा में फिर सब समाए
है सत्य नियम यही धरा का
एक आ रहे है एक जा रहे है
जिन्होने भेजा जगत में जाना
तय कर दिया लौट के फिर से आना
जो भेजने वाले है यहाँ पे
वही तो वापस बुला रहे है
बैठे है जो धान की बालियो में
समाए मेहंदी की लालियो में
हर डाल हर पत्ते में समाकर
गुल रंग बिरंगे खिला रहे है
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं
कर्मण्येवाधिकारस्ते
भज गोविन्दम्
श्री हरि स्तोत्रम्
कितना प्यारा है श्रृंगार
श्री गोवर्धन महाराज
श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी
बनवारी रे जीने का सहारा तेरा नाम रे
फूलों में सज रहे हैं
राधे राधे
मैं आरती तेरी गाऊं
एक राधा एक मीरा
श्री जगन्नाथ आरती
मैं तो आई वृन्दावन धाम
श्रीकृष्ण शरणाष्टक
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