
जय जय संकटा भवानी
करहूं आरती तेरी
शरण पड़ी हूँ तेरी माता
अरज सुनहूं अब मेरी
नहिं कोउ तुम समान जग दाता
सुर-नर-मुनि सब टेरी
कष्ट निवारण करहु हमारा
लावहु तनिक न देरी
काम-क्रोध अरु लोभन के वश
पापहि किया घनेरी
सो अपराधन उर में आनहु
छमहु भूल बहु मेरी
हरहु सकल सन्ताप हृदय का
ममता मोह निबेरी
सिंहासन पर आज बिराजें
चंवर ढ़ुरै सिर छत्र-छतेरी
खप्पर खड्ग हाथ में धारे
वह शोभा नहिं कहत बनेरी
ब्रह्मादिक सुर पार न पाये
हारि थके हिय हेरी
असुरन्ह का वध किन्हा
प्रकटेउ अमत दिलेरी
संतन को सुख दियो सदा ही
टेर सुनत नहिं कियो अबेरी
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