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Shiv Rudrashtakam

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॥ श्री ॥

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्॥१॥

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं

गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम्।

करालं महाकालकालं कृपालं

गुणागारसंसारपारं नतोहम्॥२॥

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं

मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम्।

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनीचारुगङ्गा

लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥३॥

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं

प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं

प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥४॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं

अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।

त्र्यशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं

भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥५॥

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी

सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।

चिदानन्दसंदोह मोहापहारी

प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥६॥

॥ ॐ नमः शिवाय ॥ 🕉️ जब जीवन में उथल-पुथल हो और मन को शांति न मिल रही हो, तो गोस्वामी तुलसीदास जी रचित “श्री शिव रुद्राष्टकम

) का आश्रय लेना चाहिए।

यह स्तोत्र रामचरितमानस (उत्तरकाण्ड) का एक अनमोल रत्न है। इसे ‘कागभुशुण्डि’ जी ने अपने गुरु भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए गाया था जब वे उनके श्राप से ग्रसित थे। भगवान शिव, जो ‘आशुतोष’ (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) हैं, इस स्तुति को सुनकर तुरंत पिघल गए।

इसकी पहली पंक्ति “नमामीशमीशान निर्वाण रूपं

) ही इतनी प्रभावशाली है कि यह सीधा आत्मा को स्पर्श करती है। चाहे महाशिवरात्रि हो, सावन का सोमवार हो, या घर में रुद्राभिषेक हो, इस अष्टकम के बिना शिव पूजा अधूरी मानी जाती है।

आइए, श्रद्धाभाव से इस पावन स्तोत्र का पाठ करें।जानकारी

)विवरण

)स्तोत्र का नामशिव रुद्राष्टकम

)पहली पंक्तिनमामीशमीशान निर्वाण रूपंरचयितागोस्वामी तुलसीदासस्रोतश्री रामचरितमानस (उत्तरकाण्ड)देवताभगवान शिव (रुद्र रूप)फलशिव कृपा और मन की शांति

॥ शिव स्तुति ॥

न यावद् उमानाथपादारविन्दं

भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं

प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥७॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां

नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।

जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं

प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥८॥

॥ फल श्रुति ॥ रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये । ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥

॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरामचरितमानसे रुद्राष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

नमामीशमीशान…: हे मोक्ष स्वरूप, विभु, व्यापक और ब्रह्मवेद स्वरूप ईश्वर! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप निज स्वरूप में स्थित, निर्गुण और इच्छा रहित हैं।

कलातीत कल्याण…: आप कलाओं से परे, कल्याण करने वाले और कल्प का अंत (प्रलय) करने वाले हैं। हे कामदेव के शत्रु (मन्मथारी)! आप मुझ पर प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।

न जानामि योगं…: मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न ही पूजा। हे शम्भो! मैं सदा आपको नमन करता हूँ। बुढ़ापा और जन्म-मृत्यु के दुखों से जलते हुए मुझ दुखी की आप रक्षा करें।

शीघ्र प्रसन्नता: यह स्तोत्र भगवान शिव को सबसे प्रिय है। इसे सुनने मात्र से वे भक्त की गलतियों को क्षमा कर देते हैं।

शांति: अंतिम श्लोक (न जानामि योगं…) समर्पण का भाव है, जिससे मन का भारीपन दूर होता है।

ग्रह दोष: शनि और राहु जैसे क्रूर ग्रहों की शांति के लिए रुद्राष्टकम का पाठ अचूक माना जाता है।

शिव रुद्राष्टकम हमें सिखाता है कि ईश्वर आडंबर से नहीं, बल्कि सरलता और समर्पण से मिलते हैं। जब आप कहें— “प्रसीद प्रसीद प्रभो” (प्रसन्न होइये प्रभु), तो इसे पुकार कर कहें।

आने वाली महाशिवरात्रि पर, जब आप शिवलिंग पर जल चढ़ाएं, तो इस स्तोत्र का पाठ जरूर करें।

🙏 जय भोलेनाथ! 🙏 क्या यह स्तोत्र आपको मानसिक शांति देता है? कमेंट में

” लिखकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करें।

– जय हनुमान ज्ञान गुन सागर

॥ जय हो ॥

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About this bhajan

Meaning, tradition and how to sing it

Shiv Rudrashtakam Lyrics is a chalisa dedicated to Shiva Ji, sung in homes, temples, and community sabhas across India.

The bhajan opens with the line "Namaamiishamiishaan nirvaanaruupan", a verse devotees often recite while lighting the evening lamp or gathering for kirtan.

On this page you can read the complete lyrics in Hindi (Devanagari), Hinglish (Roman transliteration), English translation. Use the language toggle above to switch scripts, adjust the font size for comfortable reading, and save the bhajan to revisit during your next sabha or solo practice.

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