
आयो फागणियो अलबेलो,
बाबा श्याम धणी को मेलो,
चाल्यो भगता को यो रेलो,
खाटू श्याम जी,
ओ खाटू धाम जी।।
तर्ज – धरती धोरा री।
कपड़ो रेशम वालो ल्यायो,
खुद हाथा निशाण बणायो,
गोटो चारू मेर लगायो,
अन्तर छ्डक्यो निशाण के ऊपर,
फिर में ढोक दियो सर रखकर,
बांध्यो जोर से कमर के ऊपर,
यो निशान जी,
ओ गेला माही ठाठ अनोखा,
खातिर करे भगत की चोखा,
तू भी क्यूं चूके ये मौका,
सारा नाचता कूदता आया,
सब प्रेमिया से प्रेम बढ़ाया,
मिलकर घणा ही आनन्द आया,
खाटू धाम जी।।
पूरो खाटू नगरी घूम्यो,
मनडो म्हारो घणो ही झूम्यो,
जद मुं थारी चौखट चूम्यो,
थारा विशाल दर्शन पाया,
नैणा झर झर नीर बहाया,
इतना दिना में मैं क्यूं आया,
दर्शण कर बाबा सू बोल्यो,
‘राजू’ जो भी श्याम को होल्यो,
थे किस्मत को तालों खोल्यो,
उकी घर करे यू रूखाली,
उको बण ज्या यो खुद हाली,
ओ खाटू श्याम जी।।
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