
इंच्छा पोर धरी धन काया,
डरता ही नाम दिखाया ए हा,
सूतो जीव अचेत नींद में,
पियु को आयो जगाया रे संतो,
मेरा भेद मे पाया हा,
मै हूँ ब्रह्म अटल अविनाशी,
ना कोई मेरे छाया रे संतो,
कारण काज तिरीयो इन जुग मे,
गुरुमुखी ग्यान सुनाया ए हा,
अरे भडक्या जीव भरमना उपजी,
भडक्या जीव भरमना उपजी,
ओयक शिश निवाया रे संतो,
तपीयो जीव चरन रे माई,
त्राटक डोर तोनाया ए हा,
आव गमन अलग कर दिनी,
दूर कियो दुखदाया रे संतो,
कर्म खाइ कोने कर दिना,
सत का वचन सुनाया ए हा,
चन्दन सा कहे तन डंका,
अमरलोक पहुँचाया रे संतो,
इच्छा पोर धरी धन काया,
गायक – प्रकाश माली जी।
प्रेषक – मनीष सीरवी
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