
इस योग्य हम कहाँ है,
गुरुवर तुम्हें रिझाए,
फिर भी मना रहे है,
शायद तू मान जाए,
तर्ज – दुनिया ने दिल दुखाया।
जब से जनम लिया है,
विषयों ने हमको घेरा,
छल और कपट ने डाला,
इस भोले मन पे डेरा,
सद्बुद्धि को अहम ने,
हरदम रखा दबाए,
निश्चय ही हम पतित है,
लोभी है स्वार्थी है,
तेरा ध्यान जब लगाए,
माया पुकारती है,
सुख भोगने की इच्छा,
कभी तृप्त हो ना पाए,
जग में जहाँ भी देखा,
बस एक ही चलन है,
एक दूसरे के सुख से,
खुद को बड़ी जलन है,
कर्मो का लेखा जोखा,
कोई समझ ना पाए,
जब कुछ ना कर सके तो,
तेरे चरण में आए,
अपराध मानते है,
झेलेंगे सब सजायें,
गोविन्द से अब मिला दो,
कुछ और हम ना चाहे,
स्वर – बृज रस अनुरागी पूनम दीदी।
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