
सुणजो रे संसारी लोगो,
ऐड़ो जमानो आवेला।
राजारामजी कहे मेरे बंदव,
कर्म धर्म मिट जावेला ।।
एक सेर रो धान बिकेला,
पानी टांक तुलेला ।
भूमि बीज उपज तज देसी,
इंद्र नही बरसावेला ।।
मनको बढ़ जासी ज्यादा,
धान हाथ नही आवेला ।
एक रोटी रे कारण लड़ कर,
अपनो पराण गवावेला ।।
दान पुण्य में धयान न धरसी,
पाप गानों बढ़ जावेला ।
देवा ने पूजे नही पापी,
ईस्वर ने नही धावेला ।।
राजा खुद तो राज तजसी,
जागीरी सब जावेला ।
पूंजी पति तो एक पलक में,
निर्धनिया हो जावेला ।।
भाई ने भाई नही जाने,
एक नार नही रेवेला ।
थारी मारी करता करता,
यु लड़ता मर जावेला ।।
सासरिया रे सिरो लापसी ,
उजली खीर रंदावेला ।
काका बाबा ओर मात पिता ने ,
गाली देन भगावेला ।।
बेटो बाप रो कयो नई माने,
अकड़ तनो अकड़ावेला ।
बुढ़िया में अकल नही है,
पागल के बतलावेला ।।
नेम धर्म सगळो तज देसी,
सब दिन पैसा कमावेला ।
ईस्वर ने ईस्वर नही जाने,
आप भृमा बन जावेला ।।
टाबर ने रोटी नही मिलसी,
सब दिन सोर मचावेला ।
भूका मिरता फिरे भटकता,
महामारी ओर हैजो पड़सी,
हाहाकार मच जावेला ।
काली माता तो चक्कर सलावे,
भेरू डमरू बजावेला ।।
सासुजी तो गठी फेरे,
सुसरो पानी लावेला।
ढोलिये बेठोडी बनड़ी,
आख्या सु डरावेला ।।
जात पात री रीत न रेसी,
एक जात बन जावेला ।
राजारामजी कहे मेरे बांधव,
कर्म धर्म हठ जावेला ।।
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