
ओर कहीं ना जायें
ओर कहीं ना जायें, ओर कहीं ना जायें,
बृज़ रजधानी छोड़ कर, ओर कहीं ना जाये.....
बृज रज महिमा जिसने जानीं,
उसकी बदली जीवन कहानी,
बातों में किसी की आयें,
ओर कहीं ना जाये.....
रज में लोटकर संत मुनिं जन, जीवन सफल बनायें,
श्याम भी मुख लपटायें,
इस बृज रज की महिमा को, पागल भी है गाये,
धसका भी धसता जाये,
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