
कुछ मांगू नहीं कुछ बोलुं नहीं
कुछ मांगू नहीं कुछ बोलुं नहीं,
मैं श्याम से,
मुझे खुशियां मिल जाती हैं,
श्याम के नाम से,
पहचान मिली है,
मुझको खाटू धाम से,
मेरे श्याम से,
तर्ज – कब तक छुप बैठे।
मैं एक कदम ही बढाया,
ये देख श्याम मुस्काया,
मैं पहुँचा इसकी शरण में,
मुझे बढकर गले लगाया,
मेरी गुजर बसर तो,
होने लगी आराम से,
कभी सखा मेरा बन जाता,
कभी भाई मेरा बन जाता,
कभी बनकर बाबुल मुझको,
बड़े प्रेम से है समझाता,
मैं हो जाता हूँ मस्त,
प्रेम के जाम से,
जिस हाल में रखता है ये,
मैं रहता हूँ राजी राजी,
मैं दिन सुदामा जैसा,
मेरी कुटिया महल बना दी,
चौखाने तू भी लगन,
लगा ले श्याम से,
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