
खाटू के श्याम धणी की,
महिमा अपार है,
जो माँगना है सो माँगो,
सच्चा दरबार है,
तर्ज – अफसाना लिख रही हूँ।
कलयुग में हारो का तो,
जीना मुहाल है,
इस झूठे जग में ये ही,
रखता ख्याल है,
बाबा की शरण में आके,
हर मझधार पार है,
अखियों के आँसुओ से,
अब क्या करना गिला,
मेरे साँवरे की भक्ति,
देगी खुशियों से मिला,
बाबा की कृपा से उजड़ा,
चमन भी गुलज़ार है,
दरबार में पावन ज्योत के,
बड़े अजब नज़ारे है,
दर पे आने वालों के,
चमके सितारे है,
‘रूबी रिधम’ कहते ये,
बड़ा दानी दातार है,
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