
गुरु के वचन को मान मेरा भवरा,
अरे हट जाय जम का खटका मनवा,
त्याग जगत का लटका ए हा।।
ममता मार धार धर समता,
परदा हटा रे घट का ए हा,
अरे ममता मार धार धर समता,
विर हिमेश नाय तुरंत ही,
रूप त्याग दे तटका रे मनवा,
त्याग जगत का लटका,
तज अभिमान भजन कर हरी का,
मिट जाय जमका फटका ए हा,
अरे तज अभिमान भजन कर हरी का,
अरे मन को मार सुधार वचन को,
अरे मन को सुधार वचन को,
इन्द्र दिखाजद जटका रे,
जबतक स्वास चले काया मे,
अरे पीव प्रेम का लटका ए हा,
अरे जबतक स्वास चले काया मे,
पीव प्रेम का लटका ए हा,
अरे मान बढाई त्याग करो नित,
दास त्रिवेणी तटका,
मनवा त्याग जगत का लटका,
भई निश्चय हो वासना छूटे,
अरे निश्चय होय वासना छूटे,
अरे भेद मिटे घट घट का ए हा,
अरे अमृत अपना रूप लिखे तब,
अमृत ऐसा घटका,
भाईडा त्याग जगत का लटका,
गायक – शंकर जी टाक।
प्रेषक – मनीष सीरवी
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