
जोबन धन पावना दिन चारा जी,
दोहा – आया था किस कारणे,
ने सोया चादर तान,
एक दिन जम ले जावसी,
पकड तुम्हारे कान।
ज्यारो गरब करे सु गिवारा ओ,
जोबन धन पावणा दिन चारा जी।।
अरे हाड मास का बनीया पिंजरा,
भीतर भरीया भंगारा,
ए ऊपर रंग सोने रो लगायो जी,
ऊपर रंग सोने रो लगायो,
कारीगर किरतारा ओ,
अरे पशु चाम रा बने पनेहा,
पशु चाम रा बने पनेहा,
नोपत मंडे नगाडा जी,
नर तेरी चाम काम नही आवे जी,
नर तेरी चाम काम नही आवे,
बल जल होवे अंगारा,
दस मस्तक ज्यारी बीस भुजा थी,
रावण के परिवारा जी,
अरे एडा एडा योध्दा धरण मे गलीया,
एडा एडा योध्दा धरण मे गलीया,
लंका के सिरदारा,
अरे ओ संसार ओस वालो पानी बीरा,
ओ संसार ओ वालो पानी,
जातोनी लागे वारा जी,
कहत कबीर सुनो भई संतो,
कहत कबीर सा सुनो भई संतो,
भवजल उतरो पारा,
गायक – प्रकाश माली जी।
प्रेषक – मनीष सीरवी
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