
जोवे जमीं पर पग धरना मारा भवरा रे
जोवे जमीं पर पग धरना,
मारा भवरा रे।
दोहा – कहे संत सगराम,
हाथ में हिरा आया,
समझ्यो नही गिवार,
गाल गोपन मे बाया।
बावत बावत बावीया,
ओर लारे बचीयो एक,
आयो हिरा रो पारखु,
जद रोयो माथो टेक।
रोयो माथो टेक एडा मे,
घणा गमाया,
कहे संत सगराम,
ओ जोवें जमीं पर पग धरना,
ए मारा भवरा रे,
ओ मारा भवरा रे,
जोवे जोवे ने वस्तु लेना।।
ऊंडा सागर रो हंसा,
संगडो नही करनो रे,
पाल बैठे ने पग धोना,
ओ पाल बैठे ने पग धोना,
ऊंचा तरवर रो हंसा,
नीचे पडीयोडा फल खाना,
ओ नीचे पडीयोडा फल खाना,
पराई नारी रो हंसा,
पद पंचो मे नही खोना,
ओ पद पंचो मे नही खोना,
नव सौ रे नदियाँ,
निन्यानवे नाला ओ,
एतो उतरना घणा दोरा,
निन्यानवे नाला रे,
ओ एतो उतरना घणा दोरा,
कहत कबीर सुनो भई साधु रे,
हरि ने लागे वे नर प्यारा,
अरे रामजी ने लागे वे नर प्यारा,
ओ हरि ने लागे वे प्यारा,
गायक – प्रकाश माली जी।
प्रेषक – मनीष सीरवी
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