
तारो तारण हारी
किशन कन्हाई, तोरा नाम
तारे जो, हज़ारों तुमने
, क्या, मेरा नहीं नाम,,,
जैसी राह, मिली जग में, मैं वैसी चलती आई,
पाँच तत्त्व की, काल कोठरी, काज़ल से पुतवाई
कान्हा तुम पे, भी तो लगा था
, ठग्गी, का इल्जाम,,,
चार बनाए, वैरी तूने, लड़ती फिरूँ अकेली,
कौन बचाए, दर दर भटकूँ, चादर हो गई मैली
तूने, भी तो द्वारका
, डुबाए, रखो धाम,,,
पल पल बदले, खेल जगत में, पल पल बदले पासा,
तोरे सहारे, जीतना चाहूँ, जो तोड़े ना आशा
वचन, निभाया तूने
, कहाया, घनश्याम,,,
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