
तेरी महफिल में गुनगुनाने से,
दोस्ती हो गई मुझ दीवाने से,
मुझे अपना के छोड़ मत देना,
डर मुझे लगता है रूठ जाने से,
तेरी चौखट को चूमता ही रहूं,
ना हटू गैर के हटाने से,
मुझे मदहोश बना ही डाला,
जब से आया मैं तेरे मयखाने से,
मेरी जुबां पर जिक्र तेरा रहे,
बेफिकर हो गया मैं अब मर जाने से,
मिल गई मंजिले सफर मुझको,
तेरे कदमों में सर झुकाने से,
मिला है तोहफा हमको पागल का,
चित्र विचित्र की गजल गाने से,
स्वर – श्री चित्र विचित्र जी महाराज।
प्रेषक – शेखर चौधरी।
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