
दुनिया के जुल्मो सितम से जो,
हार जाता है,
उसको दुनिया में मेरा श्याम ही,
अपनाता है,
तर्ज – हर पर कदम कोई कातिल।
रिश्ते नाते जहाँ के,
सारे निभाए हमने,
ना सुकून पाया,
दिए ज़ख्म नए से ग़म ने,
कश्ती जीवन की,
मेरे बाबा लगी है थमने,
अब तो खाटू का ही एक,
रस्ता याद आता है,
एक यही तो ठिकाना है,
ग़म के मारों का,
है मेरा श्याम ही बस,
साथी बेसहारों का,
है यही माली हर चमन का,
हर नज़रों का,
देख कर आह के कांटे,
जो घबराता है,
श्याम के नाम का तो ‘धीरज’,
भी दीवाना है
है लिया बाँध अगर रिश्ता,
अब निभाना है,
मिले थे धोखे हमें जिनसे,
उन्हें दिखाना है,
हो वो छोटा या बड़ा सबको,
गले लगाता है,
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