
पत्थर की मूरत बोल पड़ी
पत्थर की, मूरत बोल पड़ी, क्या मुझे, मनाने आया है
तेरे घर में, जननी तड़प रही
, क्या तुझे, तरस नहीं आया है ,
घर में तेरी, मईया भूखी है, क्या उस से, भोजन की पूछी
मुझे भोग, लगाने को बेटा
, यह छप्पन, भोग लाया है ,
प्यासी घर में, तेरी माँ बैठी, बूंद बूंद को, बेटा तरस रही
क्या मुझे, पिलाने को बेटा
, तूँ भर भर, लोटा लाया है ,
तेरी माँ के, कपड़े फ़टे हुए, एक साड़ी, तक ना लाया है
और मुझे, ओढ़ाने को बेटा
, तूँ लाल, चुनरिया लाया है ,
तेरी एक, झलक को पाने को, कब से तेरी, मईया तरस रही
मेरी एक, झलक ही पाने को
, तूँ मीलों, चलकर आया है ,
तूँ अपनी, माँ को मना लेना, सीने से, उसे लगा लेना
तेरे सारे, कष्ट ही मिट जाएंगे
, क्यों मुझे, मनाने आया है ,
सुन लो अब, दुनियाँ वालो तुम, अपने मात पिता की, सेवा करो
उस में ही, माँ दुर्गा बैठी
, महाँ माया की, सब माया है ,
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