
परिवार का बोझा जो कंधो पर ढोता है
परिवार का बोझा जो,
कंधो पर ढोता है,
कोई और नहीं प्यारे,
वो बाप ही होता है।।
परिवार की खातिर वो,
जब घर से निकलता है,
पैरो के तले अपने,
अरमान कुचलता है,
हालात से जो अक्सर,
करता समझौता है,
गंभीर दिखाई दे,
बेटे की पढ़ाई पे,
पत्थर भी मोम होता,
बेटी की बिदाई पे,
सीने से लगा बेटी,
वो फुट के रोता है,
दुनिया में पिता से ही,
पहचान मिली हमको,
सूरज सी चमकती जो,
वो शान मिली हमको,
सम्मान की माला में,
प्रतिभा को पिरोता है,
हर दुःख हर चिंता को,
हसकर के वो झेले,
बच्चो पे मुसीबत हो,
वो मौत से जा खेले,
मेहनत के पसीने से,
‘नरसी’ दुःख धोता है,
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