
बजरंगी की पूजा होती,
मंगल और शनिवार,
मेहन्दीपुर लगा के बैठे,
बाला जी अपना दरबार,
तर्ज – बार बार तोहे क्या समझाए।
हाथ में मुगधर लाल लंगोटा,
रूप विशाल,
ये बलकारी मारुति नंदन,
बे-मिसाल,
चैत्र सुदी पूनम को जन्मे,
महिमा है अपरम्पार,
प्रभु राम का जिसने भी,
गुण गाया है,
बजरंगी ने उसको,
गले लगाया है,
ले के शरण में अपनी उसको,
कर देते उद्धार,
कैसी भी हो विपदा,
दूर भागते है,
इसलिए संकटमोचन,
कहलाते है,
नर तो क्या नारायण भी,
माने इसका उपकार
मंगल कारी मंगल,
करते है प्रभु
शनिवार को भक्त चढ़ाते,
इन्हें सिंदूर,
‘रूबी रिधम’ दर शीश झुकाते,
करते जय जयकार,
स्वर – इंदु जी शर्मा।
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