
मेरी सुरता सुहागण नार पिये ने किया भूल गई
मेरी सुरता सुहागण नार,
पिये ने किया भूल गई।
दोहा – निवण बड़ी संसार में,
ओर नहीं निवे सो नीच,
निवे नदी रो गुदलो,
रेव नदी के बीच।
अरे निवे अंबा अमली,
ओर निवे दाड़मदाख,
इरड बिचारा क्या निवे,
जारी ओछी कहीजे जात।
शशि बिना सुनी रेण,
ज्ञान बिना हिरदा सुना,
गज सुना बीन दांत,
नीर बिना सागर सुना,
कुल सुना बीन पुत।
पात बिना तरवर सुना,
घटा बिना सुनी दामिनी,
बेताल कहे सुन विक्रमा।
घर सुनो बिन कामनी,
अरे शशि ने तारे रेन,
ज्ञान ने हिरदो तारे,
गज ने तारे दंत,
नीर ने सागर तारे,
अरे कुल ने तारे पूत,
पात ने तरुवर तारे,
घटा ने तारे दामिनी,
बेताल के सुण विक्रमा,
घर ने तारे कामनी।
सदा संग रहती पीवरिये मे,
पीवरीये रो लोग,
पूर्व ली पुण्याई सेती,
आय मिलो संजोग,
अरे मेरी सुरता सुहागन नार,
पीवरियो मतलब रो घर जी,
स्वार्थ को संसार,
अरे ना कोई तेरा ना तू किसकी,
झूठा करती प्यार,
गुरु गम गेणो पहर सुहागण,
सज सोलह सिंगार,
नाय धोय के चलो रे ठाठ से,
कद मिल सी भरतार,
होय आधीण मिलो प्रीतम से,
धरो रे चरण में शीश,
बारूबालम समरथ तेरो,
गुना करलो बख्शीश,
मेरी सुरता सुहागन नार,
गायक – रामकुमार जी मालुनि।
प्रेषक – सुभाष सारस्वा काकड़ा
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