
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है
मेरे सतगुरु दीनदयाल
काग से हंस बनाते है
अजब है संतो का दरबार
जहाँ से मिलती भक्ति अपार
शब्द अनमोल सुनाते है
की ह्रदय का भ्रम मिटाते है
गुरु जी सत का देते ज्ञान
जीव का ईश से लगता ध्यान
वो अपना ज्ञान लुटाते है
की मन की प्यास बुझाते है
हो करलो गुरु चरणों का ध्यान
सहज प्रकाश हो जाएगा ज्ञान
कि भव से पार लगाते हैं
मेरे सतगुरु दीनदयाल काग से हंस बनाते है
गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना
कोई शिष्य गुरु चरणों में जब शिष्य झुकता है
शरण प्रभु की आओ रे यही समय है प्यारे
गुरु महाराज मिलके कहो सब गुरु महाराज
गुरु बड़े सबसे बड़े गुरु से बड़ा ना कोय
मेरा जीवन मेरी दुनिया है गुरु
गुरुदेव से निराला कोई और नही
कुछ ना बिगड़ेगा तुम्हारा गुरु की शरण आने के बाद
बलिहारी बलिहारी मैं गुरु चरण कमल पे वारी मैं
हे गुरु देव प्रणाम आपके चरणों में
जनम दिन मुबारक हो बार बार कहते है
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