
मेरे सतगुरू तेरी नौकरी,
सबसे बढ़िया है सबसे खरी।।
तर्ज-जिंदगी की ना टूटे लड़ी।
तेरे दरबार की हाजरी,
खुशनसीबी का जब गुल खिला,
तब कही जाके ये दर मिला,
हो गई अब तो रहमत तेरी,
मै नही था किसी काम का,
ले सहारा तेरे नाम का,
बन गई अब तो बिगड़ी मेरी,
जबसे तेरा गुलाम हो गया,
तबसे मेरा भी नाम हो गया,
वरना औकात क्या थी मेरी,
मेरी तनख्वाह भी कूछ कम नही,
कूछ मिले ना मिले ग़म नही,
होगी ऐसी कहाँ दुसरी,
इक वीयोगी दीवाना हूँ मै,
खाक चरणों की चाहता हूँ मै,
आखरी ईल्तेजा है मेरी,
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