
मैं अपने राम को रिझाऊं,
राम को रिझाऊं ।
अपने श्याम को रिझाऊं,
डाली छेड़ू न पत्ता छेड़ू,
ना कोई जिव सताऊं ।
पात पात में प्रभु बसत है,
वाही को शीश नवाऊँ ।।
गंगा ने जाऊ जमुना ने जाऊ,
ना कोई तीरथ नहाऊं ।
अडसठ तीरथ घट के भीतर,
तिन्ही में मलके नहाऊं ।।
ओषधि खाऊं ना बूटी लाऊँ,
ना कोई वैध बुलाऊँ ।
पूर्ण वैध अविनासी,
वाही को नबज दिखाऊं ।।
ज्ञान कुठारा कस कर बाँधू,
सूरत कमान चढ़ाऊँ ।
पांच चोर बसे घट भीतर,
तिनको मार गिराऊं ।।
योगी होऊं न जटा बढ़ाऊ,
ना अंग विभूत रमाऊँ ।
जेहि का रंग रंगे विधाता,
और क्या रंग चढ़ाऊँ ।।
चंद्र सूर्ये दोऊ समकार राख्यो,
निजमन सेज बिछाऊं ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
आवागमन मिटाऊं ।।
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