
राधिका प्रेम भक्ति रस आली,
दोहा – उस भूमि को कौन बखान सके,
जिस भूमि पे खेली है भानु दुलारी,
ऋषि योगी तपस्वी और सिद्ध,
नहीं जान सके सो गए मतिहारी।
शेष महेश दिनेश गणेश,
सब त्याग के मान गए बलिहारी,
जहाँ रास रचावत देखे सदा,
अलबेली लली और टेढ़े बिहारी।
अलबेली सरकार है जिसकी,
हर एक बात निराली,
तर्ज – कन्हैया ले चल परली पार।
इस जीवन का सार है राधा,
मनमोहन का प्यार है राधा,
जिसको शरण लगाए उसकी,
श्याम करे रखवाली,
राधे राधे जिसको भाए,
लोहा भी कंचन बन जाए,
जो ध्याए उसके घर मनती,
बारहों मास दिवाली,
मन भवरा जो कुसुम कली का,
‘किशनदास’ वृषभानु लली का,
रसिक रसीली सदा भगत का,
मान बढ़ाने वाली,
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