
रूप सलोना देख श्याम का
कमली श्याम दी कमली, नी कमली श्याम दी कमली,
रूप सलोना देख श्याम का, सुध बुध मेरी खोयी ।
नी में कमली होई, नी में कमली होई,
सखी पनघट पर, यमुना के तट पर, लेकर पहुंची मटकी,
भूल गयी सब एक बार जब, छवि देखि नटखट की ।
देखत ही में हुईं बाँवरी उसी रूप में खोयी,
ये संगीन जमाल चेहरा, सखियों को भा गया है,
आँखों के रास्ते वो दिल में समा गया है ।
नज़र कह रही है नाज़ा में तू आजा,
ये दिल कह रहा है तू दिल में समा जा ।
क्यों फेर लिया मुख मेरी तरफ से,
ओ प्यार नवल की अब तू दिखा जा ।।
कदम के नीचे अखियाँ मीचे, खड़ा था नन्द का लाला,
मुख पर हंसी, हाथ में बंसी, मोर मुकुट माला ।
तान सुरीली मधुर नशीली, तनमन दियो भिगोई,
सास ननद मुझे पल पल कोसे, हर कोई देवे ताने,
बीत रही मुझ बिरहन पर, ये कोई ना जाने ।
पूछे सब निर्दोष बाँवरी, तट पे तू कहे गयी,
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