
सदा सतसंग की महिमा मुबारक हो मुबारक हो
सदा सतसंग की महिमा,
मुबारक हो मुबारक हो।।
जगत को जलता देख करके,
प्रभु ने ज्ञान घटा भेजी,
बुझावे ताप त्रिय को,
शोक संशय सब भागे,
गरजना संतों की सुन के,
वर्षावे ज्ञान अमृत को,
बिना जप योग यज्ञ तप के,
सतसंग भव तारन गंगा,
समागम संतों का ऐसा,
भवसिंधु पार होने का,
जहाज सतसंग है जग में,
खेवैया महात्मा साधू,
हजारों खल कुटिल पामर,
सतसंग से तिर गये पापी,
‘अचलराम” फिर भी तिरते जात,
गायक – समुद्र सूरेला।
रचना – स्वामी अचलराम जी महाराज।
प्रेषक – सांवरिया निवाई।
हिंदी · Read on Bhajan Baan
Share this bhajan with your family
Send it to your satsang group before kirtan so everyone has the words.

