
सन्तो देखों भजन री लहरी,
दोहा – अमर लोक से बिछड़िया हंसा,
आय कर नगर बसाया,
आया जका घर भूलगा,
माया से मोह लगाया।
मैं तो सतगुरु शब्दों हेरी,
उलटा पवन गिगन जाय लागा,
जहाँ देखी एक डेरी,
उण डेरी में म्हारा सतगुरु तापे,
जहाँ लागी लिव मेरी,
उण डेरी में वृक्ष देखियो,
डाळ पान नहीं पेरी,
उण वृक्ष रे रूप न रेखा,
फळ लागे चौफेरी,
उण डेरी में सात समन्द हैं,
नव सौ नदियाँ गहरी,
औलू दोलू रत्नागर सागर,
बीच में इमरत बेरी,
उण डेरी में बाजा बाजे,
बाजे आठों पहरी,
मृदङ्ग ताल पखावज बाजे,
मुरली बाजे गहरी,
अगम अगोचर निर्भय होया,
क्या पूछो गम मेरी,
कहत कबीर सा सुणो भाई साधों,
निर्गुण माळा फेरी,
प्रेषक – रामेश्वर लाल पँवार।
आकाशवाणी सिंगर।
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