
साँवरे की सेवा में जो भी रम जाते है
साँवरे की सेवा में,
जो भी रम जाते है,
बाबा ही संभाले उन्हें,
वो फिर दुःख ना पाते है,
तर्ज – आदमी मुसाफिर है।
जीवन में होते इतने झमेले,
इक दिन तो इंसा जाता अकेले,
बिता समय तो पछताते है,
अपना सगा हमने जिसको माना,
मुश्किल पड़ी तो निकला बेगाना,
संकट में बाबा ही काम आते है,
वक़्त सभी का बनता बिगड़ता,
समझे नजाकत वो है संभलता,
गीता में भगवन समझाते है,
मन और वचन कर्म हो ठीक तेरा,
‘चोखानी’ तो फिर कटता है फेरा,
सत कर्म ही ‘गिन्नी’ रह जाते है,
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