
साँसों का क्या भरोसा रुक जाए चलते चलते
साँसों का क्या भरोसा,
रुक जाए चलते चलते,
जीवन की है जो ज्योति,
बुझ जाए जलते जलते,
तर्ज – चलते चलते यूँही कोई मिल
जीवन है चार दिन का,
दो दिन की है जवानी,
जब आएगा बुढ़ापा,
थक जाए चलते चलते।
समझा ना तू इशारा,
समझा ना खेल इसका,
क्यों तेरी बात बिगड़ी,
हर बार बनते बनते।
तेरे साथ जाए ‘रजनी’,
तेरे कर्मो की कमाई,
गए जग से बादशाह भी,
यूँही हाथ मलते मलते।
अब तक किया ना ‘सोनू’,
अब तो हरी सुमिर ले,
कह रही है जिंदगी की,
ये शाम ढलते ढलते।
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