
हर हर में हरि हरि बसे,
और हर को हरि की आस
हरि हरि को मैं ढूँढ फिरी,
और हरि है मेरे पास
प्रीतम हम तुम एक हैं, मोरे प्रीतम
प्रीतम हम तुम एक हैं.
जो कहन सुनन में दो
मन से मन को तोलिए,
दो दो मन कबहूँ न होए
आ श्यामा इन नैनन में,
जो पलक ढाँप तोहे लूँ
न मैं देखूँ गैर को,
न तोहे देखन दूँ
हाथ छुड़ावत जात हो,
जो निर्मन जान के मोहे
ह्रदय मे से जाओ तो,
तब मैं जानू तोहे
नील गगन से भी परे,
सईंया जी का गाँव
दर्शन जल की कामना,
पत रखियो हे घनश्याम
जब से राधा श्याम के,
नैन हुये हैं चार
श्याम बने हैं राधिका,
राधा बन गयी श्याम
साँसों की माला पे
सिमरूँ मैं, श्याम का नाम
अपने मन की, मैं जानूँ,
और पी के, मन की राम
साँसों की माला,,,,,,,,,,
प्रेम के रंग में, ऐसी डूबी
बन गया, एक ही रूप
प्रेम की माला, जपते जपते
आप बनी, मैं श्याम
प्रीतम का कुछ, दोष नहीं है
वो तो है, निर्दोष
अपने आप से, बातें करके
हो गयी मैं, बदनाम
जीवन का सिंगार, है प्रीतम
माँग का है, सिंदूर
प्रीतम की, नजरों से गिरकर
जीना है, किस काम
प्रेम प्याला, जब से पीया है
जी का, है यह हाल
अंगारों पे, लेटा चाहे
काँटों से, आराम
अपलोड करता- अनिल रामूर्ति भोपाल
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