
सुमिरन क्यों नि करे,
क्यों रे मन सुमिरन क्यो नि करे।
रावण कंस हिरणाकुश मारयो,
ध्रुव प्रहलाद विभीषण तारयो,
तू उनसे क्यों राड़ करे,
साधू संत तुझे समझावे,
अगम को पंथ तुझे बतलावै,
तू कोई के भी पत नि करे,
देख देख तू क्यों इतरायो,
जाणु थारे किने भरमायो,
तू माया को साथ करे,
मेरा मेरा करके गंवाए,
साथ ना तेरे कोई जाए,
तेरा तेरह दिन याद करे,
नौ दस मास तुझे समझायो,
कोल करार करी तू आयो,
अब आड़ी टेढ़ी बात करे,
बेगम देश चलो रे मन मेरा,
सतगुरु का जहाँ लगा है डेरा,
वहां अमृत बून्द झरे,
शब्द का डंका जहाँ नित बाजे,
जगमग आँगन जहाँ है लागे,
वहां नित नया मोती परे,
मांगी चादर में दाग लगायो,
संत सरोवर कभी नहीं नहायो,
फिर जम की भेंट चढ़े,
स्वर – पं. श्री कमल किशोर जी नागर।
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