
आजा रे कन्हैया आजा रे
मेरे, मन की, शहनाई, रो रो के, तुझे पुकारे
कभी ये, बजा करती थी, अपनी ही धुन में ।
खिलते थे, फूल मेरे, मन उपवन में ॥
सुर भी, आज पड़े हैं मध्यम, ये सारे के सारे
मेरे मन की शहनाई, रो रोकर, तुझे...
आज, बज रही है ये तो, जग के इशारो पे ।
तुझ पर, असर नहीं होगा, इसकी पुकारों से ॥
कोई, ख़ुशी के, कोई गम के, करता इसे ईशारे
गाती, रही है ये तो, गीत बेबसी के ।
गाएगी, कब ये मोहन, गीत ख़ुशी के ॥
बाट उडीके, तेरी संजू, हर दिन साँझ सकारे
हर हर महाँदेव
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