
आज सपनो में साजन की,
सजनी बनी,
वो मेरा बन गया,
उनकी मैं बन गयी,
उनकी बांकी अदाओं की,
क्या बात है,
पहली पहली ये उनसे,
मुलाकात है,
थोड़ी शरमाई सी,
थोड़ी घबराई सी,
एक टक उनको ही,
देखती रह गई,
चाँद की चांदनी,
जैसे मैं बन गई,
राग की रागनी,
यूँ लगा बनके,
मोहन की मैं मोहनी,
मुरली बनकर के,
होंठों पे मैं सज गई,
कैसा सुन्दर सजा था,
मुकुट मोर का,
तिरछा था चरण,
मेरे चितचोर का,
सखी मोहन के नैनो की,
नैया में मैं,
बैठते ही ना जाने,
कहाँ खो गई,
स्वर – धीरज बावरा जी।
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