
कागलिया गेरो रे मिठो बोल,
गुरु सा आवेला जद पावणा,
आवेला जद पावणा,
सोने चौच मंडाय दु थारी,
हीरा हजारी टोप,
चांदी चढ़ाऊं पंख्या थारी,
गले सोने री डोर,
जिण मार्ग सतगुरु सा आवे,
फुलड़ा देव बिछाय,
पलकों रा पावड़िया करने,
आसन देऊ बिठाय,
प्रीत घिरतरा भोजन परोसु,
कर मनवार जीमाऊ,
मीठा वचन मिश्री रा घोलू,
पंखी वाव ढूलाऊं,
शब्द सुनावे ज्ञान बतावे,
दुरमति दूर भगावे,
‘उदय सिंह’ आनंद में डूबे,
तू बोले गुरु आवे,
गायक – उदय सिंह जी राजपुरोहित।
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