
कितना खोया कितना पाया,
तोल सके तो तोल रे,
तूने हीरा गंवाया पगले,
माटी के मोल,
बिरहन क्यों उलझी झंझट में,
तेरा पिया है तेरे घट में,
कह गए दास कबीर देख ले,
घुंघट के पट खोल रे,
पीकर प्रेम सुधा रस प्याली,
बोल उठी मीरा मतवाली,
राम रतन धन पायो सद्गुरु,
वस्तु दिनी अमोल रे,
बिन भगवंत भजन पछितायो,
रे मन मूरख जन्म गंवायो
गूंज रहे जन-जन के मन में,
सूरदास के बोल,
अब तो चैत अरे अभिमानी,
गूंज रही तुलसी की वाणी,
भाय कुंभाय अनघ आलसुं,
नाम प्रभु का बोल,
श्री चैतन्य कृष्ण मतवाले,
डोल डोल कर द्वारे द्वारे,
हरि बोल का अलख जगाये,
बजा मंजीरे ढोल,
क्षणभंगुर संसार विनाशी,
सार कह्यो सद्गुरु अविनाशी,
‘जैन राजेश’ सुमिर हरि को,
जी चाहे जहां डोल,
स्वर – श्री अंकुश जी महाराज।
प्रेषक – ओमप्रकाश पांचाल उज्जैन मध्य प्रदेश।
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