
दो है काया एक प्राण की
जहाँ राम हैं वहीँ जानकी
प्रभु जी आप हैं अंतर्यामी
मन की व्यथा को समझे स्वामी
हे नाथ सुनले अंतर्वाणी
साथी बना ले वन-उपवन की
पति ही छाया पति ही भूषण
पति चरणों में अखण्ड पूजन
पति का संग है नारी जीवन
रीत न टूटे विधि विधान की
जनम जनम का है अपना नाता
आप ही मेरे भाग्य विधाता
प्रेम में दुःख भी सुख बन जाता
महिमा न भूले गठ बंधन की
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