
डगर है मुश्किल कठिन सफर है,
मगर मुसाफिर जगा नहीं है,
जो सोएगा बस वही खोएगा,
ये बात उसको पता नहीं है,
तर्ज – तुम्हारी नज़रों में हमने।
लगेंगे फल जब किसी वृक्ष में,
वो पेड़ झुक जाएंगे स्वतः ही,
अकड़ तने की बता रही है,
अभी फल इसमें लगा नहीं है,
जो खानदानी रईस होते,
मिजाज रखते है नर्म अपना,
तुम्हारा लहजा बता रहा है,
तुम्हारी दौलत नई नई है,
जरा सा कुदरत ने क्या नवाजा,
की आके बैठे हो पहली शफ में,
अभी से उड़ने लगे हवा में,
अभी ये शोहरत नई नई है,
स्वर – श्री देवेन्द्र जी महाराज।
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