
तुमसा नहीं माँ कोई,
और वरदानी,
मेरी माँ भवानी,
तर्ज – मुझे और जीने की।
दिल की व्यथाएँ किसको सुनाऊँ,
तुम्हारे सिवा माँ किसको बताऊँ,
चरणों में तेरे,
बीते जिंदगानी,
आँचल में अपने मुझे माँ छिपालो,
भटकूँ कहीं ना अपना बनालो,
पार लगा दो मेरी,
नाव है पुरानी,
जमाना कहे क्या मुझे गम नहीं है,
बनूँ मैं तुम्हारा तमन्ना यही है,
लगन मैं लगाया तुमसे,
करो मेहरबानी,
विश्वास करले माँ पे मिलेगा किनारा,
सच्चे हृदय से जिसने पुकारा,
”परशुराम”की ये नैया,
पार है लगानी,
लेखक – परशुराम उपाध्याय।
“श्रीमानस-मण्डल”,वाराणसी।
नोट – वीडियो उपलब्ध नहीं है।
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