
धोरा री धरती में मारा,
जांभोजी पधारिया,
हाथ में कमंडल काली माला,
मारा जांभोजी,
थाने मनावण मैं आया।।
धोरा री धरती में गुरु जी,
आसन लगायो,
ज्योति जगाई हद भारी,
पीपासर में गाया चराई,
लोवटजी रो माने बढ़ायो,
मारा गुरुजी,
रोडू नगरी आप पधारिया,
उमा बाई रो भात भरायो,
म्हारा जांभोजी,
अंधीया ने गुरुजी अंखियां दीनी,
कोडिया री कष्ट मीटायो,
‘मदनलाल’ री सुणजो विनती,
भवजल पार उतारो,
प्रेषक – सुभाष सारस्वत मदनलाल पुस्करणा
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