
मंदिर में एक मूरत देखी ऐसी,
बिल्कुल लगती मईया तेरे जैसी।।
अपने पास बुलाकर मुझको,
गोदी में बिठाया,
हाथ फिराया सर पे मेरे,
बड़े प्रेम से खिलाया,
जैसे खिलाती हो तुम हलवा देसी,
मेरे मन को भा गई है,
तेरी सूरत भोली,
हर पल तेरे संग रहूंगी,
मईया मुझ से बोली,
मेरे रहते तुमको चिंता कैसी,
जहाँ भी जाता मंदिर में माँ,
वही मुझे मिल जाती,
कभी इशारा करके बुलाती,
और कभी मुस्काती,
मुझको बिल्कुल न लगती परदेसी,
जैसे मैं तेरी माँ वैसे,
वो सारे जग की माँ है,
‘श्याम’ कहे उसके वश में,
ये धरती आसमा है,
शक्ति नहीं कोई वो ऐसी वैसी,
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