
मन नाम जपो हरि नाम जपो,
भव सागर से तर जाएँगे रे,
तर्ज – मत प्यार करो परदेसी से।
इन ऊँचे ऊँचे महलो का,
मत करना तू अभिमान कभी,
जिनको तू यहाँ अपना समझे रे,
जिनको तू यहाँ अपना समझे,
ये अपने यहीँ रह जाएँगे रे,
हरि भजन ही असली मक़सद है,
सँसार मे अपने आने का,
मक़सद अपना पूरा करले रे,
मक़सद अपना पूरा करले,
वर्ना यूँ ही मर जाएँगे रे,
जीवन को अपने करले सफल,
तू जाग भी जा अब तो प्यारे,
हरि भजन बिना नही कोई तरा,
फिर हम कैसे तर पाएँगे रे,
– भजन लेखक एवं प्रेषक –
शिवनारायण वर्मा,
मोबा.न.8818932923
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