
माटी के पुतले रे,
तेरा अपना यहाँ नहीं कोय,
सतगुरु ने कितना समझाया,
अब काहे को रोए रे,
ऐ अब काहे को रोय,
तर्ज – पिंजरे के पंछी रे।
भूखा प्यासा रह कर तू ने,
करदी न्योछावर,
ये जिन्दगानी रे,
जिसकी खातिर महल बनाया,
वो ही न तेरा होय,
करले जो भी करना है तुझको,
समय सुहाना बिता जाए रे,
चला गया ये समय तो पगले,
फिर वापस न होय,
खुद के लिए कुछ कर ले कमाई,
बीत रही तेरी जिन्दगानी रे,
कल कल में जीवन कई बीते,
कल न तेरा होय,
– भजन लेखक एवं प्रेषक –
श्री शिवनारायण वर्मा,
मोबा.न.8818932923
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