
मैं तो उन रे संता रो हूँ दास,
जिन्होंने मन मार लिया,
ओ मेतो उन रे संता रो हूँ दास,
अरे मार लिया मनडा मार लिया,
मार लिया मनडा मार लिया,
मन मारीया तन वश किया,
भय भरमना दूर,
अरे मन मारीया तन वश किया,
अरे बाहर तू क्यु दिखत नाही,
ओ भीतर बरसे नूर,
अरे आपा बाहर जगत में बैठा,
नहीं किसी से काम,
ओ गुरू नहीं किसी से काम,
अरे कुल मे कुछ अंतर नहीं,
अरे कुल मे कुछ अंतर नाही,
ओ संत कहू चाहे राम,
अरे प्याला पाया प्रेम का,
छोड जगत मोह,
अरे प्याला पाया प्रेम रा,
ओ माने सतगुरु ऐसा मिलया,
माने सतगुरु ऐसा मिलीया,
ओ सहेजे मुक्ति दोय,
अरे नरसीजी रा सतगुरु स्वामी,
दिया अमृत पाय,
अरे एक बूंद सागर मे मिलगी,
क्या तो करे जमदूत,
गायक – शंकर जी टाक।
प्रेषक – मनीष सीरवी
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