
श्याम सांवरा मेरे घर आ गया,
ना खाटू जाता था,
ना कीर्तन करता था,
ना ज्योत जलाता था,
ना भजन सुनाता था,
बातें बनाता था,
हर ग़म छुपाता था,
ना मुस्कुराता था,
दुनिया से हारा था।
आने से उसके आने से उसके,
आने से घर रोशन हो गया,
श्याम साँवरा,
आ गया आ गया सांवरा आ गया,
मेरा बाबा शीश का दानी सांवरा आ गया।।
तर्ज – प्यार करने वाले कभी।
जो ना हुआ है वो अब हो रहा है,
कभी जो ना सोचा वो सब हो रहा है,
बाबा को मैंने भी जी भर के देखा,
बदलने लगी मेरे हाथों की रेखा,
अब मैं तुम्हे और क्या क्या बताऊँ,
कैसे कहूं इसने क्या क्या दिया,
कोई कमी हो मुझे माफ़ करना,
गलती को मेरी ना तुम ध्यान धरना,
आते रहो बाबा तुम घर मेरे,
सेवा करूँ तेरी आठों पहर मैं,
चरणों की सेवा में ‘नागर’ को रखना,
दरबार तेरा मुझे भा गया,
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