
सुरता पकड़ चम्पा री डाल,
दोहा – सोहंग शब्द प्रकाशियो,
गुरु भेद दियो भरपूर,
कर्म कटिया सांसा मिटिया,
घट बीच उगो सुर।
सुहागन क्यों रे खड़ी,
सुरता काई थारो पियो परदेश,
के थाने सासु रे लड़ी।।
सुरता चलियो जा रे मूर्ख गिवार,
थासू मारे के रे पड़ी,
सुरता पियो मारो गयो परलोक,
संदेशो लिया रे खड़ी,
सुरता पकड़ चंपा री डाल,
सुरता पीयूजी गया सतलोक,
थारो के लेर गया,
सुरता जुड़ गया सजड किवाड़,
कुच्या सारी लेर गया,
सुरता धरा गगन अध बीच,
भवँर दोय पाखिया,
सुरता पीयूजी मिलवा रो घणो कोड,
फरुखे दोई आखिया,
सुरता चावल सु भरी परात,
ऊपर धरी आरसी,
सुरता जिम कोई संत सुजान,
लखे हर री पारसी,
सुरता चारु पाया दिवलो संजोय,
मंदिरिया में सोवती,
सुरता पिया बिना लागे सुने सेज,
नजर भर जोवती,
सुरता इन सरवरिया री पाल,
हंसा दोनु पावणा,
सुरता सत सत भणे कबीर,
फेर नही आवना,
गायक – श्यामनिवास पिलोवनी।
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