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देशभक्ति पर टॉप 10 कविताएँ

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॥ श्री ॥

बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से,

लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से।

लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,

तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से।

खुली है मुझको लेने के लिए आग़ोशे आज़ादी,

ख़ुशी है, हो गया महबूब का दीदार फांसी से।

कभी ओ बेख़बर तहरीके़-आज़ादी भी रुकती है?

बढ़ा करती है उसकी तेज़ी-ए-रफ़्तार फांसी से।

यहां तक सरफ़रोशाने-वतन बढ़ जाएंगे क़ातिल,

कि लटकाने पड़ेंगे नित मुझे दो-चार फांसी से।

-राम प्रसाद बिस्मिल

ध्यान बापू का प्रथम मैंने किया है,

क्योंकि मुर्दों में उन्होंने भर दिया है

नव्य जीवन का नया उन्मेष फिर से!

आज से आजाद अपना देश फिर से!

दासता की रात में जो खो गये थे,

भूल अपना पंथ, अपने को गये थे,

वे लगे पहचानने निज वेश फिर से!

स्वप्न जो लेकर चले उतरा अधूरा,

एक दिन होगा, मुझे विश्वास, पूरा,

शेष से मिल जाएगा अवशेष फिर से!

देश तो क्या, एक दुनिया चाहते हम,

आज बँट-बँट कर मनुज की जाति निर्मम,

विश्व हमसे ले नया संदेश फिर से!

हम ऐसे आज़ाद, हमारा

झंडा है बादल!

चांदी, सोने, हीरे, मोती

से सजतीं गुड़ियाँ,

इनसे आतंकित करने की बीत गई घड़ियाँ,

इनसे सज-धज बैठा करते

जो, हैं कठपुतले।

हमने तोड़ अभी फैंकी हैं

बेड़ी-हथकड़ियाँ,

परम्परा पुरखों की हमने

जाग्रत की फिर से,

उठा शीश पर हमने रक्खा

हिम किरीट उज्जवल!

से सज सिंहासन,

जो बैठा करते थे उनका

खत्म हुआ शासन,

उनका वह सामान अजायब-

घर की अब शोभा,

उनका वह इतिहास महज

इतिहासों का वर्णन,

नहीं जिसे छू कभी सकेंगे

शाह लुटेरे भी,

तख़्त हमारा भारत माँ की

गोदी का शाद्वल!

से सजवा छाते

जो अपने सिर पर तनवाते

थे, अब शरमाते,

फूल-कली बरसाने वाली

दूर गई दुनिया,

वज्रों के वाहन अम्बर में,

निर्भय घहराते,

इन्द्रायुध भी एक बार जो

हिम्मत से औड़े,

छ्त्र हमारा निर्मित करते

साठ कोटि करतल।

का हाथों में दंड,

चिन्ह कभी का अधिकारों का

अब केवल पाखंड,

समझ गई अब सारी जगती

क्या सिंगार, क्या सत्य,

कर्मठ हाथों के अन्दर ही

बसता तेज प्रचंड,

जिधर उठेगा महा सृष्टि

होगी या महा प्रलय,

विकल हमारे राज दंड में

साठ कोटि भुजबल!

तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ मैं

मेरे प्यारे देश! देह या मन को नमन करूँ मैं

किसको नमन करूँ मैं भारत? किसको नमन करूँ मैं

भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है

नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है

भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है

मेरे प्यारे देश! नहीं तू पत्थर है, पानी है

जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं

तू वह, नर ने जिसे बहुत ऊँचा चढ़कर पाया था,

तू वह, जो संदेश भूमि को अम्बर से आया था।

तू वह, जिसका ध्यान आज भी मन सुरभित करता है,

थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है।

गन्ध -निकेतन इस अदृश्य उपवन को नमन करूँ मैं

वहाँ नहीं तू जहाँ जनों से ही मनुजों को भय है,

सब को सब से त्रास सदा सब पर सब का संशय है।

जहाँ स्नेह के सहज स्रोत से हटे हुए जनगण हैं,

झंडों या नारों के नीचे बँटे हुए जनगण हैं।

कैसे इस कुत्सित, विभक्त जीवन को नमन करूँ मैं

तू तो है वह लोक जहाँ उन्मुक्त मनुज का मन है,

समरसता को लिये प्रवाहित शीत-स्निग्ध जीवन है।

जहाँ पहुँच मानते नहीं नर-नारी दिग्बन्धन को,

आत्म-रूप देखते प्रेम में भरकर निखिल भुवन को।

कहीं खोज इस रुचिर स्वप्न पावन को नमन करूँ मैं

भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है

एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है

जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है

देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है

निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं!

खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से

पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से

तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है

दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है

मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं!

दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं

मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं

घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन

खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन

आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं!

उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है

धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है

तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है

किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है

मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं!

वनिता की ममता न हुई, सुत का न मुझे कुछ छोह हुआ,

ख्याति, सुयश, सम्मान, विभव का, त्योंही, कभी न मोह हुआ।

जीवन की क्या चहल-पहल है, इसे न मैंने पहचाना,

सेनापति के एक इशारे पर मिटना केवल जाना।

मसि की तो क्या बात? गली की ठिकरी मुझे भुलाती है,

जीते जी लड़ मरूं, मरे पर याद किसे फिर आती है

इतिहासों में अमर रहूँ, है ऐसी मृत्यु नहीं मेरी,

विश्व छोड़ जब चला, भूलते लगती फिर किसको देरी

जग भूले, पर मुझे एक, बस, सेवा-धर्म निभाना है,

जिसकी है यह देह उसीमें इसे मिला मिट जाना है।

विजय-विटप को विकच देख जिस दिन तुम हृदय जुड़ाओगे,

फूलों में शोणित की लाली कभी समझ क्या पाओगे

वह लाली हर प्रात क्षितिज पर आकर तुम्हें जगायेगी,

सायंकाल नमन कर माँ को तिमिर-बीच खो जायेगी।

देव करेंगे विनय, किन्तु, क्या स्वर्ग-बीच रुक पाऊँगा

किसी रात चुपके उल्का बन कूद भूमि पर आऊँगा।

तुम न जान पाओगे, पर, मैं रोज खिलूँगा इधर-उधर,

कभी फूल की पंखुड़ियाँ बन, कभी एक पत्ती बनकर,

अपनी राह चली जायेगी वीरों की सेना रण में,

रह जाऊँगा मौन वृन्त पर सोच, न जाने, क्या मन में

तप्त वेग धमनी का बनकर कभी संग मैं हो लूँगा,

कभी चरण- तल की मिट्टी में छिपकर जय-जय बोलूँगा।

अगले युग की अनी कपिध्वज जिस दिन प्रलय मचायेगी,

मैं गरजूंगा ध्वजा-श्रृंग पर, वह पहचान न पायेगी।

‘न्योछावर में एक फूल’, पर, जग की ऐसी रीत कहाँ

एक पंक्ति मेरी सुधि में भी, सस्ते इतने गीत कहाँ

कविते! देखो विजन विपिन में वन्य-कुसुम का मुरझाना,

व्यर्थ न होगा इस समाधि पर दो आँसू-कण बरसाना।

तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो तू चल अकेला,

चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला!

तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो चल तू अकेला,

जब सबके मुंह पे पाश..

ओरे ओरे ओ अभागी! सबके मुंह पे पाश,

हर कोई मुंह मोड़के बैठे, हर कोई डर जाय!

तब भी तू दिल खोलके, अरे! जोश में आकर,

मनका गाना गूंज तू अकेला!

जब हर कोई वापस जाय..

ओरे ओरे ओ अभागी! हर कोई बापस जाय..

कानन-कूचकी बेला पर सब कोने में छिप जाय…

नहीं मांगता, प्रभु, विपत्ति से,

मुझे बचाओ, त्राण करो

विपदा में निर्भीक रहूँ मैं,

इतना, हे भगवान, करो।

नहीं मांगता दुःख हटाओ

व्यथित ह्रदय का ताप मिटाओ

दुखों को मैं आप जीत लूँ

ऐसी शक्ति प्रदान करो

कोई जब न मदद को आये

मेरी हिम्मत टूट न जाये।

जग जब धोखे पर धोखा दे

और चोट पर चोट लगाये –

अपने मन में हार न मानूं,

ऐसा, नाथ, विधान करो।

नहीं माँगता हूँ, प्रभु, मेरी

जीवन नैया पार करो

पार उतर जाऊँ अपने बल

इतना, हे करतार, करो।

नहीं मांगता हाथ बटाओ

मेरे सिर का बोझ घटाओ

आप बोझ अपना संभाल लूँ

ऐसा बल-संचार करो।

सुख के दिन में शीश नवाकर

तुमको आराधूँ, करूणाकर।

औ’ विपत्ति के अन्धकार में,

जगत हँसे जब मुझे रुलाकर–

तुम पर करने लगूँ न संशय,

यह विनती स्वीकार करो।

एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए,

कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए,

इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े,

और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए!

किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा।

जय बोलो उस धीर व्रती की जिसने सोता देश जगाया,

जिसने मिट्टी के पुतलों को वीरों का बाना पहनाया,

जिसने आज़ादी लेने की एक निराली राह निकाली,

और स्वयं उसपर चलने में जिसने अपना शीश चढ़ाया,

घृणा मिटाने को दुनियाँ से लिखा लहू से जिसने अपने,

“जो कि तुम्हारे हित विष घोले, तुम उसके हित अमृत घोलो।”

कठिन नहीं होता है बाहर की बाधा को दूर भगाना,

कठिन नहीं होता है बाहर के बंधन को काट हटाना,

ग़ैरों से कहना क्या मुश्किल अपने घर की राह सिधारें,

किंतु नहीं पहचाना जाता अपनों में बैठा बेगाना,

बाहर जब बेड़ी पड़ती है भीतर भी गाँठें लग जातीं,

बाहर के सब बंधन टूटे, भीतर के अब बंधन खोलो।

कटीं बेड़ियाँ औ’ हथकड़ियाँ, हर्ष मनाओ, मंगल गाओ,

किंतु यहाँ पर लक्ष्य नहीं है, आगे पथ पर पाँव बढ़ाओ,

आज़ादी वह मूर्ति नहीं है जो बैठी रहती मंदिर में,

उसकी पूजा करनी है तो नक्षत्रों से होड़ लगाओ।

हल्का फूल नहीं आज़ादी, वह है भारी ज़िम्मेदारी,

उसे उठाने को कंधों के, भुजदंडों के, बल को तोलो।

मुझको है विश्वास किसी दिन

घायल हिंदुस्तान उठेगा।

दबी हुई दुबकी बैठी हैं

कलरवकारी चार दिशाएँ,

ठगी हुई, ठिठकी-सी लगतीं

नभ की चिर गतिमान हवाएँ,

अंबर के आनन के ऊपर

एक मुर्दनी-सी छाई है,

एक उदासी में डूबी हैं

तृण-तरुवर-पल्लव-लतिकाएँ;

आंधी के पहले देखा है

कभी प्रकृति का निश्चल चेहरा?

इस निश्चलता के अंदर से

ही भीषण तूफान उठेगा।

इसी घर से

एक दिन

शहीद का जनाज़ा निकला था,

तिरंगे में लिपटा,

हज़ारों की भीड़ में।

काँधा देने की होड़ में

सैकड़ो के कुर्ते फटे थे,

पुट्ठे छिले थे।

भारत माता की जय,

इंकलाब ज़िन्दाबाद,

अंग्रेजी सरकार मुर्दाबाद

के नारों में शहीद की माँ का रोदन

डूब गया था।

उसके आँसुओ की लड़ी

फूल, खील, बताशों की झडी में

छिप गई थी,

जनता चिल्लाई थी-

तेरा नाम सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा।

गली किसी गर्व से

दिप गई थी।

तीस बरस बाद

शहीद की माँ का जनाजा निकला है,

तिरंगे में लिपटा नहीं,

(क्योंकि वह ख़ास-ख़ास

लोगों के लिये विहित है)

केवल चार काँधों पर

राम नाम सत्य है

गोपाल नाम सत्य है

के पुराने नारों पर;

चर्चा है, बुढिया बे-सहारा थी,

जीवन के कष्टों से मुक्त हुई,

गली किसी राहत से

छुई छुई।

॥ जय हो ॥

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About this bhajan

Meaning, tradition and how to sing it

देशभक्ति पर टॉप 10 कविताएँ is a bhajan dedicated to Durga Ji, sung in homes, temples, and community sabhas across India.

The bhajan opens with the line "बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से,", a verse devotees often recite while lighting the evening lamp or gathering for kirtan.

On this page you can read the complete lyrics in Hindi (Devanagari). Use the language toggle above to switch scripts, adjust the font size for comfortable reading, and save the bhajan to revisit during your next sabha or solo practice.

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