
दूर उस आकाश की गहराइयों में,
एक नदी से बह रहे हैं आदियोगी,
शून्य सन्नाटे टपकते जा रहे हैं,
मौन से सब कह रहे हैं आदियोगी,
योग के स्पर्श से अब योगमय करना है तन मन,
साँस सास्वत सनन सनननन,
प्राण गुंजन धनन धन धन,
उतरे मुझमे आदियोगी,
योग धारा चलत छण छण,
पीस दो अस्तित्व मेरा,
और कर दो चूरा चूरा,
पूर्ण होने दो मुझे और,
होने दो अब पूरा पूरा,
भस्म वाली रस्म कर दो आदियोगी,
योग उत्सव रंग भर दो आदियोगी,
बज उठे यह मन सितरी,
झणन झणन झणन झणन झन झन ।
योग धारा छलक छन छन,
मुझे अपने ही रंग में रंग ले
मुश्किल है सहन करना ओ दर्द जुदाई का
शुभ फलदायी है मां सरस्वती के 12 नाम
भगवान शिव के 108 नाम
आदियोगी: योग का स्रोत
आज भूखा ना सोए कोई
बस इतनी तमन्ना है महावीर तुम्हे देखूं
राम भक्त
टोली भक्तां की
बालाजी अर्ज़ी स्वीकार करे
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