
Bajrang Ke Aate Aate
बजरंग के आते आते कही भोर हो न जाये रे,
ये राम सोचते हैं, श्री राम सोचते हैं ।।
क्या भोर होते होते बजरंग आ सकेंगे,
लक्ष्मण को नया जीवन फिर से दिला सकेंगे
कही सास की ये डोरी कमजोर हो न जाये रे,
कैसे कहूँगा जा के मारा गया है लक्ष्मण,
तज देगी प्राण सुन के माता सुमित्रा फ़ौरन
कहीं यह कलंक मुझसे इक और हो ना जाए रे,
लक्ष्मण बिना है टूटा यह दांया हाथ मेरा,
कुछ सूझता नहीं है चारो तरफ अँधेरा
लंका में कहीं घर घर ये शोर हो ना जाये रे
वर्ना अटल है ‘शर्मा’ मेरी बात ना टलेगी,
लक्ष्मण के साथ मेरी ‘लख्खा’ चिता जलेगी
मैं सोचता तो कुछ हूँ, कुछ और हो न जाये रे,
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