
चुंदड़ी जयपुर ते मंगवाई, रे इंडि सोने की घड़वाई …
गळे में कंठी गेर के ने , टोकणी चाँदी की या ठाई,
रूप कती निखरया पाट रया जिगरा, बहू की मान गी काली,
दामण निचे पेहरी जुत्ती , बण गी देखो चीज कसूती,
या गजबण पाणी न चाली… या गजबण पाणी न चाली…
या गजबणी पाणी न चाली… गजबण पाणी न चाली…
नौ लखे ने फेल करे, तेरे माथे आळा टीक्का,
आंख्या के काजल के आगे ,सारा सौदा फिक्का,
चाँद का टुकडां, बैरण का मुखड़ा कसुती गालां पे लाली …
पायल भी प्यारी लागे और, खुड़का भी अनमोल कति,
झुमके भी दिखें से महंगे, पाट्या कोन्या तोल कदी..
या देखो हांसी करे, बदमाशी, नाक में नथली या डाली…
अम्बरा आळी हूर परी, कुछ कोन्या इसके आगे,
मुकेश जाजी देख लिये, आज भीड़ कुवे पे लागे,
म्बरा आळी हूर परी, कुछ कोन्या इसके आगे,
गांम का मौसम बण ग्या, ओसम बाजी दिलां में ताली …
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